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जूनागढ़ की कहानी : आखिर क्यों गवानी पड़ी पाकिस्तान को कश्मीर जाने पूरी कहानी …..

news .2.0 present/  15 अगस्त 1947 की बात है। भारत में लोग आजादी के जश्न में डूबे हुए थे। वहीं दूसरी ओर समंदर किनारे बसे जूनागढ़ रियासत की प्रजा असमंजस में थी। वजह बना जूनागढ़ के नवाब महाबत खान का फैसला। 15 अगस्त 1947 को ही उन्हाेंने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने का फैसला लिया था।

तभी एंट्री होती है उस वक्त के भारतीय गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की। सरदार पटेल ऐसी रणनीति बनाते हैं कि जूनागढ़ दो महीने के अंदर जूनागढ़ के नवाब को पाकिस्तान भागना पड़ता है। साथ ही 3 महीने के ही अंदर यानी 9 नवंबर 1947 को जूनागढ़ भारत का हिस्सा बन जाता है।

भास्कर एक्सप्लेनर में हम बताएंगे कि क्या थी वो रणनीति जिससे सरदार पटेल ने पाकिस्तान को मात दी? आखिर क्यों कहा जाता है कि पाकिस्तान ने जूनागढ़ के चक्कर में कश्मीर को गंवा दिया?

देश आजादी का जश्न मना रहा था, तभी धोखे से जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने का ऐलान होता है

अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के साथ सरदार वल्लभ भाई पटेल।
अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन के साथ सरदार वल्लभ भाई पटेल।
1947 में भारत का बंटवारा हो चुका था। अंग्रेजी हुकूमत ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 लागू किया था। इसके तहत लैप्स ऑफ पैरामाउंसी ऑप्शन दिया गया था। इससे 565 रियासतों के राजा अपनी रियासत को भारत या पाकिस्तान से जोड़ सकते थे या फिर अपना स्वतंत्र राष्ट्र बना सकते थे।

15 अगस्त 1947 तक ज्यादातर रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल हो चुकी थीं। लेकिन तीन रियासतों के विलय का मामला उलझा हुआ था। ये तीन रियासतें- जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद थीं।तीनों में हैदराबाद और जूनागढ़ की स्थिति एक-सी थी। 80% से 85% आबादी हिंदू थी और शासक मुस्लिम। लेकिन कश्मीर में परिस्थिति उल्टी थी। वहां राजा हिंदू था और तीन-चौथाई कश्मीरी मुसलमान थे। देखा जाए तो मोहम्मद अली जिन्ना की ‘टू नेशन थिअरी’ के हिसाब से जूनागढ़ का विलय भारत में होना चाहिए था।

15 अगस्त 1947 को जब भारत के लोग आजादी का जश्न मना रहे थे तब जूनागढ़ के लोग कंफ्यूजन में थे, क्योंकि इसी दिन जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान के साथ जाने का ऐलान कर दिया था। यानी साजिश रची जा चुकी थी। जूनागढ़ के दीवान शाहनवाज भुट्टो की इसमें मुख्य भूमिका रही थी। कहा जाता है कि नवाब महाबत खान भारत के साथ रहना चाहते थे, लेकिन शाहनवाज ने उनकी बात नहीं मानी। शाहनवाज उस वक्त सिंध से मुस्लिम लीग के नेता थे और मोहम्मद अली जिन्ना के करीब थे।

‘वॉर एंड पीस इन मॉडर्न इंडिया’ में श्रीनाथ राघवन लिखते हैं कि शाहनवाज जुलाई 1947 में जिन्ना से मिलते हैं। जिन्ना बंटवारे की तारीख तक शाहनवाज से शांति बनाए रखने को कहते हैं। शाहनवाज ने जिन्ना की बात मानते हुए ऐसा ही किया। लेकिन जैसे ही 15 अगस्त 1947 की तारीख आई, भुट्टो ने ऐलान किया कि जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में होगा। यहां पर लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह को भी दरकिनार किया गया। क्योंकि जूनागढ़ जमीनी रूप से भारत से जुड़ा था और पाकिस्तान जाने के लिए समंदर पार करना पड़ता।

जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में करने वाला दस्तावेज। इस पर जूनागढ़ के नवाब महाबत खान के हस्ताक्षर भी थे।
जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में करने वाला दस्तावेज। इस पर जूनागढ़ के नवाब महाबत खान के हस्ताक्षर भी थे।
सरदार पटेल को लगा कि पाकिस्तान जूनागढ़ का विलय नहीं करेगा

शुरुआत में पटेल को लगा कि पाकिस्तान जूनागढ़ का विलय नहीं करेगा। लेकिन पटेल गलत साबित हुए। एक महीने बाद 16 सितंबर 1947 को पाकिस्तान ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा कर दी। इसका भारत ने विरोध भी किया।

इधर, पटेल ने पाकिस्तान को एक बार फिर से इस पर विचार करने के लिए कहा। साथ ही जनमत संग्रह कराने की पेशकश भी। लेकिन पाकिस्तान ने इसे नकार दिया। इसके बाद 19 सितंबर 1947 को सरदार पटेल भारत सरकार के रजवाड़ा खाते के सचिव वीपी मेनन को जूनागढ़ भेजते हैं। लेकिन मेनन को नवाब से नहीं मिलने दिया गया। साथ ही नवाब की ओर से शाहनवाज ने उनसे गोल-मोल तरीके से बात की। यानी कुछ भी साफ नहीं किया।

देसी रियासतों को भारत में मिलाने में वीपी मेनन ने अहम भूमिका निभाई थी। मेनन उस वक्त के गृहमंत्री सरदार पटेल के सेक्रेटरी थे।
देसी रियासतों को भारत में मिलाने में वीपी मेनन ने अहम भूमिका निभाई थी। मेनन उस वक्त के गृहमंत्री सरदार पटेल के सेक्रेटरी थे।
जूनागढ़ को भारत में लाने के लिए आरझी हुकूमत का ऐलान होता है

शामलदास गांधी।
शामलदास गांधी।
बॉम्बे समेत कई शहरों में नवाब के फैसले का विरोध भी तेज होता जा रहा था। इसी बीच सौराष्ट्र और जूनागढ़ से 25 से संबंधित 30 हजार लोग बॉम्बे पहुंचते हैं। इस दौरान ये लोग महात्मा गांधी के भतीजे और वंदे अखबार के संपादक शामलदास गांधी की लीडरशीप में नवाब के शासन से जूनागढ़ को मुक्त कराने का ऐलान करते हैं।

19 अगस्त 1947 को बॉम्बे में गुजराती दैनिक वंदे मातरम के कार्यालय में शामलदास गांधी, यूएन ढेबर और जूनागढ़ पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सदस्य मिलते हैं। 25 अगस्त 1947 को काठियावाड़ पॉलिटिकल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए उन्हें विशेष रूप से न्योता दिया जाता है। 15 सितंबर 1947 को 5 मेंबर वाली जूनागढ़ कमेटी बनाई जाती है। इसके बाद शामलदास गांधी वीपी मेनन से मिलते हैं और जूनागढ़ रियासत की निर्वासित सरकार आरझी हुकूमत बनाने का प्रस्ताव रखते हैं।

25 सितंबर 1947 को बॉम्बे के माधवबाग में एक जनसभा में शामलदास की अध्यक्षता में आरझी हुकूमत की घोषणा की गई। शामलदास गांधी प्रधानमंत्री बने और विदेश मामलों का मंत्रालय भी संभाला। राजकोट को आरझी सरकार का हेडक्वार्टर बनाया गया। इसके बाद आरझी हुकूमत के प्रधानमंत्री समेत 5 मंत्री राजकोट पहुंचते हैं।

आरझी लोकसेना के सरसेनापति रतुभाई अदाणी ने कहा था कि सरदार पटेल चाहते हैं कि जूनागढ़ के लोगों को ये जंग लड़नी चाहिए। अगर जूनागढ़ के लोग और उनके प्रतिनिधि आवाज उठाएंगे तो ही जूनागढ़ भारत में रह पाएगा। तब 23 सितंबर 1947 को आरझी हुकूमत बनाने का फैसला हुआ और 25 सितंबर को घोषणापत्र भी बना था।

जूनागढ़ में अस्थायी रूप से आरझी हुकूमत का राज भी रहा था।
जूनागढ़ में अस्थायी रूप से आरझी हुकूमत का राज भी रहा था।
विद्रोह देखकर जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान भाग जाते हैं

आरझी हुकूमत ने 30 सितंबर से 8 नवंबर 1947 तक यानी सिर्फ 40 दिनों में 160 गांवों पर कब्जा कर लेती है। इसके बाद भारत ने अस्थायी सरकार को जूनागढ़ के बाहरी क्षेत्रों पर नियंत्रण करने की अनुमति दी। इसके बाद जूनागढ़ के नवाब को अपना फैसला बदलने के लिए मजबूर करने के लिए आरझी हुकूमत ने काठियावाड़ के आसपास के क्षेत्रों में स्वयंसेवी बलों के सहारे नाकाबंदी कर दी।

चूंकि जूनागढ़ जमीनी रूप से भारत से घिरा हुआ था। ऐसे पाकिस्तान के ऐलान के बाद भारत सरकार ने जूनागढ़ के साथ अपने सभी व्यापार बंद कर दिए। इससे वहां पर खाने के लाले पड़ने लगे। इससे रियासत में विद्रोह की स्थिति पैदा होने लगी। रियासत पर मंडराए संकट और विद्रोह से नवाब महाबत खान डर गए। इसके बाद उन्होंने रियासत का शासन दीवान शाहनवाज भुट्‌टो को सौंप कर अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के कराची भाग गए।

जूनागढ़ के नवाब महाबत खान।
जूनागढ़ के नवाब महाबत खान।
जूनागढ़ रियासत के दीवान नवंबर तक पाकिस्तान की मदद का इंतजार करते हैं

जूनागढ़ रियासत के दीवान शाहनवाज को लगातार आरझी हुकूमत से चुनौती मिल रही थी। वे इसे रोक पाने में नाकाम साबित हो रहे थे। इसके बाद शाहनवाज 27 अक्टूबर को जिन्ना को एक पत्र लिखते हैं। इसमें उन्होंने लिखा, ‘ हमारे पास पैसे खत्म हो चुके हैं। अनाज का भंडार भी खत्म होने को है। काठियावाड़ के मुसलमानों को पाकिस्तान में कोई भविष्य नहीं दिखाई दे रहा है। इससे ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है। मंत्रिमंडल के मेरे वरिष्ठ साथी कैप्टन हार्वे जॉन्स ने आपको जूनागढ़ की स्थिति की गंभीरता बताई ही होगी।

इसके बाद जूनागढ़ रियासत के दीवान नवंबर तक पाकिस्तान की मदद इंतजार करते हैं, लेकिन कोई मदद नहीं मिलती। आरझी हुकूमत के लोकसेना ने शाहनवाज के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। इससे तनाव बढ़ता ही जा रहा था। इस बीच जूनागढ़ रियासत ने 670 मुस्लिम पुरुषों की एक फौज तैयार की। इन्हें रियासत में विद्रोह से निपटने के लिए अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया गया। लेकिन अब शाहनवाज को लगने लगा था कि विद्रोह को संभालना उनके बस की बात नहीं है।

मोहम्मद अली जिन्ना।
मोहम्मद अली जिन्ना।
9 नवंबर 1947 को भारत जूनागढ़ को अपने नियंत्रण में लेता है

2 नवंबर 1947 तक आरझी हुकूमत नवागढ़ पर भी कब्जा कर लेती है। 7 नवंबर को शाहनवाज अपने मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सहयोगी हार्वे जॉन्स को आरझी हुकूमत के प्रधानमंत्री शामलदास गांधी से मिलने के लिए राजकोट भेजते हैं। हार्वे राजकोट में शामलदास से जूनागढ़ का नियंत्रण लेने की अपील करते हैं।

हालांकि 8 नवंबर को शाहनवाज पलट जाते हैं और कहते हैं कि आरझी हुकूमत नहीं बल्कि भारत सरकार जूनागढ़ का कब्जा ले लें। इसी दिन वह पाकिस्तान भाग जाते हैं। इसी आधार पर 9 नवंबर 1947 को भारत ने जूनागढ़ को नियंत्रण में लिया।

इसके बाद जूनागढ़ का स्वतंत्रता दिवस 9 नवंबर को मनाया जाता है। सरदार पटेल की नाराजगी के बावजूद जूनागढ़ में 20 फरवरी 1948 को जनमत संग्रह कराया गया। 2,01,457 रजिस्टर्ड वोटर्स में से 1,90,870 लोगों ने वोट दिया। इसमें पाकिस्तान के लिए सिर्फ 91 मत मिले थे।

20 फरवरी 1948 को जनमत संग्रह के बाद खुशी मनाते जूनागढ़ के लोग।
20 फरवरी 1948 को जनमत संग्रह के बाद खुशी मनाते जूनागढ़ के लोग।
अब कश्मीर पर पटेल के दिलचस्पी लेने की वजह जानिए

इतिहासकार और महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने अपनी किताब- ‘पटेल अ लाइफ’ में लिखा है कि सरदार को कश्मीर में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जब जिन्ना ने अपने ही धार्मिक आधार पर बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ जाकर जूनागढ़ और हैदराबाद को पाकिस्तान में जोड़ने की कोशिश की तो पटेल कश्मीर में दिलचस्पी लेने लगे थे।

यदि जिन्ना बिना किसी परेशानी के जूनागढ़ और हैदराबाद को हिंदुस्तान में आने देते तो कश्मीर को लेकर विवाद ही नहीं होता और वह पाकिस्तान में चला जाता। जिन्ना ने इस डील को ठुकरा दिया था। बाद इसी वजह से पाकिस्तान को कश्मीर को भी अपने हाथ से गंवाना पड़ा।

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